छत्तीसगढ़ के Hasdeo Arand में एक बार फिर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और कोयला खनन को लेकर विवाद तेज हो गया है। केंद्र सरकार द्वारा लगभग 1742 हेक्टेयर क्षेत्र में माइनिंग की मंजूरी दिए जाने के बाद 4.48 लाख से लेकर 7 लाख तक पेड़ काटे जाने की आशंका जताई जा रही है। विपक्षी नेताओं, पर्यावरणविदों और स्थानीय आदिवासी समुदायों ने इस फैसले का विरोध किया है। T. S. Singh Deo और Bhupesh Baghel ने भी इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की है।
छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध जंगल क्षेत्र हसदेव अरण्य को एक बार फिर लेकर देशभर में बहस छिड़ गई है। केंद्र सरकार द्वारा कोयला खनन परियोजना के लिए लगभग 1742 हेक्टेयर वन क्षेत्र में माइनिंग की मंजूरी दिए जाने के बाद पर्यावरण, आदिवासी अधिकारों और विकास मॉडल को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
कितना बड़ा है 1742 हेक्टेयर का इलाका?
1742 हेक्टेयर क्षेत्र लगभग 4200 एकड़ भूमि के बराबर है। इसे समझने के लिए कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में करीब 3000 से अधिक फुटबॉल मैदान बनाए जा सकते हैं। इतना विशाल वन क्षेत्र यदि खनन के लिए उपयोग किया जाता है तो इसका प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा।
क्यों महत्वपूर्ण है हसदेव अरण्य?
हसदेव अरण्य को मध्य भारत का "फेफड़ा" कहा जाता है। यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है, जहां हाथी, तेंदुआ, भालू और अनेक दुर्लभ पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। इसके अलावा यह क्षेत्र हसदेव नदी और बांगो जलाशय के जलग्रहण क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
यहां हजारों आदिवासी परिवार पीढ़ियों से निवास करते हैं और उनकी आजीविका जंगलों पर निर्भर है।
विवाद की जड़ क्या है?
जानकारी के अनुसार इस क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के कुल कोयला भंडार का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। राजस्थान के बिजली उत्पादन संयंत्रों को कोयला उपलब्ध कराने के लिए यहां खनन गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि 2022 में छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सर्वसम्मति से नई खदानों का विरोध करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था। इसके बावजूद अब नई मंजूरी मिलने से राजनीतिक और सामाजिक संगठनों में नाराजगी दिखाई दे रही है।
कितने पेड़ कटेंगे?
सरकारी दस्तावेजों और विभिन्न दावों के अनुसार लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है। वहीं कुछ नेताओं और सामाजिक संगठनों का दावा है कि वास्तविक संख्या 7 लाख तक पहुंच सकती है।
इससे पहले भी क्षेत्र में हजारों पेड़ काटे जा चुके हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई का असर आने वाले वर्षों में तापमान, वर्षा और भूजल स्तर पर पड़ सकता है।
आदिवासी समुदायों की चिंता
स्थानीय आदिवासी समुदायों का कहना है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं बल्कि उनका जीवन, संस्कृति और रोजगार का आधार है। उनका मानना है कि विकास के नाम पर जंगलों को खत्म करने से उनकी पारंपरिक जीवनशैली पर गहरा असर पड़ेगा।
पर्यावरण बनाम विकास की बहस
सरकार का तर्क है कि खनन परियोजनाओं से बिजली उत्पादन और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। दूसरी ओर पर्यावरणविदों का कहना है कि बढ़ती गर्मी, जल संकट और प्रदूषण के दौर में बड़े पैमाने पर वन कटाई भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
निष्कर्ष
हसदेव अरण्य का मुद्दा केवल एक जंगल या एक खदान का नहीं है। यह विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का प्रतीक बन चुका है। आने वाले समय में अदालतों, सरकारों और समाज को मिलकर यह तय करना होगा कि आर्थिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच सही रास्ता क्या हो सकता है

एक टिप्पणी भेजें