भारत की धरती पर ऐसे अनेक मंदिर मौजूद हैं जो अपनी भव्यता, वास्तुकला और रहस्यों के कारण पूरी दुनिया को हैरान करते हैं। इन्हीं में से एक है ओडिशा के पुरी जिले में स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर,यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि प्राचीन भारतीय विज्ञान, खगोलशास्त्र और इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इस मंदिर का गर्भगृह पिछले 123 वर्षों से बंद है। इसके अंदर क्या है, यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है। इसी कारण कोणार्क सूर्य मंदिर दुनिया के सबसे रहस्यमयी मंदिरों में गिना जाता है।
1903 में क्यों बंद कर दिया गया मंदिर का गर्भगृह?
साल 1903 में ब्रिटिश शासन के दौरान बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर जे. ए. बर्डल ने कोणार्क सूर्य मंदिर का निरीक्षण किया। उस समय मंदिर की मुख्य संरचना काफी कमजोर हो चुकी थी, और इसके ढहने का खतरा बढ़ गया था,मंदिर को सुरक्षित रखने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने गर्भगृह को रेत और पत्थरों से भरवा दिया तथा सभी प्रवेश द्वारों को बंद करवा दिया। उनका मानना था कि इससे मंदिर को अतिरिक्त सहारा मिलेगा और संरचना लंबे समय तक सुरक्षित रहेगी।
आज 123 साल बाद भी गर्भगृह पूरी तरह नहीं खोला गया है, जिससे इसके अंदर छिपे रहस्य आज भी रहस्य बने हुए हैं।
कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण किसने कराया था?
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब ने सूर्यदेव की कठोर तपस्या के बाद पहला सूर्य मंदिर बनवाया था। वर्तमान में दिखाई देने वाला कोणार्क सूर्य मंदिर 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के महान राजा नरसिंह देव प्रथम द्वारा बनवाया गया था, मंदिर का निर्माण लगभग 1238 ईस्वी से 1264 ईस्वी के बीच हुआ। कहा जाता है कि इसे बनाने में लगभग 1200 कुशल कारीगरों ने 12 वर्षों तक लगातार कार्य किया था।
धर्मपद की बलिदान गाथा
कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा धर्मपद नामक 12 वर्षीय बालक की है,
कहा जाता है कि मंदिर निर्माण के अंतिम चरण में शिखर पर कलश स्थापित नहीं हो पा रहा था। राजा ने आदेश दिया कि यदि सूर्योदय से पहले यह कार्य पूरा नहीं हुआ तो सभी कारीगरों को मृत्युदंड दिया जाएगा,उसी समय मुख्य शिल्पकार बिशु महाराणा के पुत्र धर्मपद ने अपनी बुद्धिमत्ता और तकनीकी ज्ञान से कलश स्थापित कर दिया। लेकिन उसे डर था कि राजा बाकी कारीगरों को अयोग्य समझकर दंडित कर सकता है। इसलिए उसने चंद्रभागा नदी में छलांग लगाकर अपना बलिदान दे दिया।
आज भी धर्मपद की यह कहानी ओडिशा की लोककथाओं में जीवित है।
सूर्य के रथ के रूप में बना अद्भुत मंदिर
कोणार्क सूर्य मंदिर को सूर्यदेव के विशाल रथ के रूप में डिजाइन किया गया है,मंदिर में कुल 24 विशाल पत्थर के पहिए हैं जो वर्ष के 12 महीनों और दिन के 24 घंटों का प्रतीक माने जाते हैं। इन पहियों पर इतनी सूक्ष्म नक्काशी की गई है कि इन्हें देखकर आज भी विशेषज्ञ आश्चर्यचकित रह जाते हैं।
मंदिर के सामने सात घोड़ों की आकृतियां बनी थीं जो सूर्य के सात रंगों और सप्ताह के सात दिनों का प्रतीक मानी जाती हैं।
क्या कोणार्क के पहिए समय बताते हैं?
कोणार्क सूर्य मंदिर के पहियों को केवल सजावट नहीं माना जाता। कई विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्राचीन सूर्य घड़ी (Sun Dial) की तरह काम करते थे,जब सूर्य की किरणें पहियों पर पड़ती हैं तो उनकी छाया के आधार पर समय का अनुमान लगाया जा सकता है। यह प्राचीन भारत की खगोलीय और वैज्ञानिक समझ का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
52 टन के चुंबक का रहस्य
कोणार्क सूर्य मंदिर से जुड़ा सबसे चर्चित रहस्य इसके शिखर पर लगे कथित 52 टन के विशाल चुंबक का है,कथाओं के अनुसार यह चुंबक इतना शक्तिशाली था कि मंदिर के अंदर स्थापित सूर्यदेव की अष्टधातु प्रतिमा हवा में तैरती हुई दिखाई देती थी,यह भी कहा जाता है कि समुद्र से गुजरने वाले जहाजों के कंपास इस चुंबकीय प्रभाव के कारण प्रभावित हो जाते थे, जिससे नाविकों को परेशानी होती थी।
हालांकि इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों को अब तक इस विशाल चुंबक के अस्तित्व का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। फिर भी यह कहानी आज भी लोगों की जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।
क्या सचमुच हवा में तैरती थी सूर्य प्रतिमा?
कोणार्क सूर्य मंदिर से जुड़ी सबसे रहस्यमयी मान्यता यह है कि गर्भगृह में स्थापित सूर्यदेव की प्रतिमा चुंबकीय बल के कारण हवा में लटकी रहती थी,कई लोककथाओं में इसका उल्लेख मिलता है, लेकिन वर्तमान समय में इस दावे को साबित करने वाला कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
फिर भी यह रहस्य लोगों को सदियों से आकर्षित करता आ रहा है और मंदिर की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण है।
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल
कोणार्क सूर्य मंदिर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए वर्ष 1984 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया,यह मंदिर भारतीय वास्तुकला, कला और वैज्ञानिक ज्ञान का ऐसा अद्भुत उदाहरण है जिसे देखने के लिए हर वर्ष लाखों पर्यटक भारत और विदेशों से आते हैं।
क्या जल्द खुलेगा बंद गर्भगृह?
वर्ष 2022 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने मंदिर के गर्भगृह से रेत हटाने की स्थिति का अध्ययन करने की योजना बनाई थी, यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल और संवेदनशील है क्योंकि किसी भी प्रकार की गलती मंदिर को नुकसान पहुंचा सकती है।
इसलिए आज भी गर्भगृह आम जनता के लिए बंद है और उसके अंदर क्या मौजूद है, यह एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है।
निष्कर्ष
कोणार्क सूर्य मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक सोच, इंजीनियरिंग क्षमता और कला कौशल का प्रमाण है। 123 साल से बंद गर्भगृह, 52 टन के चुंबक की कहानी, हवा में तैरती प्रतिमा और सूर्य घड़ी जैसे रहस्य इसे दुनिया के सबसे रहस्यमयी स्मारकों में शामिल करते हैं।

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