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कालापानी जेल: भारत की सबसे खौफनाक जेल जहां इंसानों को बैलों की तरह जोता जाता था

  



भारत की आजादी की लड़ाई सिर्फ मैदानों में नहीं लड़ी गई थी। कुछ लड़ाइयाँ ऐसी भी थीं जो समुद्र के बीच बसे एक खौफनाक जेल के अंदर लड़ी गईं। एक ऐसी जेल जहां इंसानों को बैलों की तरह तेल के कोल्हू में जोता जाता था। जहां भूख, मार, आइसोलेशन और टॉर्चर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। यह थी Cellular Jail, जिसे भारत में “काला पानी” के नाम से जाना जाता है।

आज यह जगह एक म्यूजियम है, लेकिन कभी यहां भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारियों को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ने की कोशिश की जाती थी।

काला पानी जेल का नाम कैसे पड़ा?

पुराने हिंदू समाज में समुद्र पार करना अशुद्ध माना जाता था। ऐसा विश्वास था कि समुद्र पार करने से व्यक्ति अपनी सामाजिक और धार्मिक पवित्रता खो देता है। इसी सोच का फायदा अंग्रेजों ने उठाया।1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार समझ चुकी थी कि केवल फांसी देकर या गोली मारकर क्रांतिकारियों को नहीं रोका जा सकता। इसलिए उन्होंने एक ऐसी जेल बनाई जो सिर्फ सजा नहीं बल्कि “सोशल डेथ” देने के लिए बनाई गई थी।

इसी सोच के साथ भारत से लगभग 1255 किलोमीटर दूर Andaman and Nicobar Islands में इस जेल का निर्माण किया गया।

सेल्यूलर जेल की खतरनाक डिजाइन

इस जेल का असली नाम “सेल्यूलर जेल” था। इसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि हर कैदी पूरी तरह अकेला रहे। जेल में कुल 7 विंग्स थीं और बीच में एक बड़ा वॉच टावर बनाया गया था। इस डिजाइन का आइडिया “पैनोप्टिकॉन” मॉडल से लिया गया था। इसका मतलब था कि गार्ड हर कैदी पर नजर रख सके लेकिन कैदी यह कभी न जान पाए कि उसे देखा जा रहा है या नहीं।

हर सेल लगभग 13.5 फुट लंबा और 7 फुट चौड़ा था। छोटे-छोटे कमरों में केवल एक ऊंची खिड़की होती थी ताकि कैदी बाहर ना देख सके और किसी दूसरे कैदी से बात ना कर सके। जेल में कुल 698 सॉलिटरी सेल्स बनाई गई थीं।

 वीर सावरकर और कालापानी जेल

Vinayak Damodar Savarkar को अंग्रेजों ने “डेंजरस प्रिजनर” घोषित किया था। उन पर ब्रिटिश क्राउन के खिलाफ युद्ध छेड़ने और क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाए गए थे। जब उन्हें लंदन से भारत लाया जा रहा था तब उन्होंने फ्रांस के मार्सेई बंदरगाह पर जहाज से भागने की कोशिश भी की थी। इसी वजह से अंग्रेज उनसे बेहद डरते थे।

इतना ही नहीं, वीर सावरकर और उनके भाई गणेश सावरकर एक ही जेल में बंद थे लेकिन जेल की डिजाइन ऐसी थी कि दोनों 9 महीने तक एक-दूसरे से मिल तक नहीं पाए।

 कैदियों की जिंदगी: इंसान नहीं जानवर से भी बदतर काला पानी जेल में कैदियों को सुबह 6 बजे से शाम 5 बजे तक लगातार काम करना पड़ता था।

सबसे खतरनाक काम था तेल निकालने वाला “कोल्हू” चलाना। गांवों में जिस काम को बैल करते थे, यहां वही काम इंसानों से करवाया जाता था। कैदी को एक भारी लोहे की मशीन से बांध दिया जाता था और पूरे दिन उसे घुमाना पड़ता था। हर कैदी को रोज लगभग 30 पाउंड यानी करीब 14 लीटर तेल निकालना अनिवार्य था। अगर कोटा पूरा नहीं हुआ तो खाना नहीं मिलता था। कई कैदी बेहोश हो जाते थे, हाथों से खून निकलता था, लेकिन फिर भी उन्हें रुकने की इजाजत नहीं थी।

 भूख, गंदगी और टॉर्चर

कैदियों को बेहद खराब खाना दिया जाता था। कई बार दलिया मिट्टी के तेल की बदबू से भरा होता था। सब्जियों में सांप, कीड़े और कनखजूरा तक निकल आते थे। अगर कोई कैदी खाना खाने से मना करता तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था। वॉशरूम जाने के लिए भी तय समय था। रात 6 बजे के बाद सेल बंद हो जाती थी और सुबह तक बाहर निकलने की अनुमति नहीं मिलती थी। मजबूरी में कैदियों को छोटे मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करना पड़ता था।

अगर किसी ने सेल गंदी कर दी तो उसे पहले खुद सफाई करनी पड़ती थी और फिर सार्वजनिक रूप से टॉर्चर दिया जाता था ताकि बाकी कैदी डर जाएं।

भूख हड़ताल और फोर्स फीडिंग

1933 में कैदियों ने जेल के गंदे खाने और अत्याचारों के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह हड़ताल 45 दिनों तक चली।

इसके जवाब में अंग्रेजों ने “फोर्स फीडिंग” शुरू की। कैदियों को पकड़कर उनके नाक के जरिए रबर ट्यूब डाली जाती थी और जबरदस्ती दूध और तरल पदार्थ पेट में पहुंचाया जाता था। कई बार यह तरल फेफड़ों में चला जाता था जिससे कैदियों की मौत हो जाती थी।

Mahavir Singh, Mohan Kishore Namadas और Mohit Moitra जैसे कई स्वतंत्रता सेनानी इसी अमानवीय प्रक्रिया में शहीद हो गए ।

भागना लगभग नामुमकिन था

ज्यादा ऊंची नहीं थीं क्योंकि अंग्रेज जानते थे कि यहां से भागना लगभग असंभव है। एक तरफ विशाल समुद्र था और दूसरी तरफ घने जंगल जहां Jarawa Tribe रहती थी। बाहरी लोगों के लिए यह जंगल बेहद खतरनाक माना जाता था।

यानी अगर कोई कैदी जेल से भाग भी जाए तो उसके बचने की संभावना बेहद कम थी।

जापानी कब्जा और सुभाष चंद्र बोस

1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने अंडमान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद जेल का एक नया और खतरनाक अध्याय शुरू हुआ। 29 दिसंबर 1943 को Subhas Chandra Bose पोर्ट ब्लेयर पहुंचे और पहली बार वहां तिरंगा फहराया। हालांकि जापानी सेना ने उन्हें जेल का वही हिस्सा दिखाया जो साफ-सुथरा था।

आज का कालापानी जेल

आज Cellular Jail भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन चुकी है। यहां हर साल हजारों लोग उन वीर सेनानियों को श्रद्धांजलि देने आते हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए अमानवीय यातनाएं सही।

यह जेल सिर्फ एक इमारत नहीं बल्कि भारत के संघर्ष, बलिदान और आजादी की कीमत की सबसे बड़ी याद दिलाती है ।

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